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प्यार, कहाँ और मैं

कहाँ?
जहाँ सर उठाने को कोई डर न हो,
समझ पर कोई दर न हो,
जहाँ दुनिया को टुकड़ों में बांटता मेरा घर न हो,
मेरी आवाज़ सच्चाई के समुंदरी तल से निकले
और दिमाग इस सच पर आगे चल निकले
सोचने और करने के सतत्त बड़ते धरातल पर
क्या मैं यहाँ हूँ?




कहाँ आयूँ
जहाँ डर न हो
गलतियां करने का मेरी हंसी पर असर न हो
सीखना सजा न हो
जहाँ बड़े मुझमे संभावनाएँ देखें
समस्याएँ नहीं
आप वहां आइये
मैं जरुर मिलूंगी


प्यार की सोच
दिल में झांक के देखा, जरा नीचे  
उसके ऊपर सोच की कवायत थी  
दिल में ही जान है,
और शब्द सिर्फ मेहमान 

घर होंगे? कब तक, कितने?
ज्यादा नहीं हो गए?
कितनी आग, आग गहन करोगे  
जलोगे या रौशनी करोगे
अन्तरंग प्यार की?  
सारे विचारों को हवा करते!
(रूमी के विचारों के हिंदी समीकरण)

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